मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

सुधार की रेल

                                                       पिछले तीन दशकों में देश में मज़बूत सरकारें न बन पाने और सहयोगी दलों द्वारा महत्वपूर्ण रेल मंत्रालय को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़े जाने के कारण ही देश में रेल के विकास की जो भी संभावनाएं बन सकती थीं वे रास्ते में दम तोड़ गयीं. इन महत्वपूर्ण वर्षों में जिस तरह से रेल बिहार और बंगाल के नेताओं के तहत ही रही उससे भी देश को कोई विशेष सामाजिक और रेलवे को व्यावसायिक लाभ नहीं हुआ पर इस बार मोदी की मज़बूत सरकार बनने के बाद भी गौड़ा जैसे कम अनुभवी नेता को विभाग सौंप कर जो गलती की गयी थी उसे बहुत ही समय रहते सुधार लिया गया है और सुरेश प्रभु के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए उनसे ठोस पहल की उम्मीद भी लगायी जा सकती है. भारतीय रेल की वास्तविक आवश्यकताएं अधिकांश समय विभाग चला रहे मंत्रियों की ज़रूरतों को पूरा करने में ही लग जाती हैं जिससे विभाग की सोच भी आगे नहीं बढ़ पाती है पर अब इससे आगे बढ़ने की आवश्यकता है क्योंकि पीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में रेल भी शामिल है.
                                                        यात्री सेगमेंट में प्रभु का यह सुझाव स्वागत योग्य है कि १० घण्टे में अपना सफर तय करने वाली ट्रेनों में स्लीपर क्लास को पूरी तरह से सीटिंग क्लास से बदल दिया जाये क्योंकि इससे पूरी ट्रेन में लगने वाले डिब्बों की संख्या को वर्तमान स्थिति में रखते हुए यात्रियों की क्षमता में प्रति डिब्बे २८ की वृद्धि की जा सकती है और रेलवे को भी लगभग २००० रूपये प्रति कोच का लाभ हो सकता है तो इस स्थिति में यदि पूरी ट्रेन के १० से बारह डिब्बों को बदला जा सके तो उसी अनुपात में रेलवे का यात्री ईंधन खर्च काफी नियंत्रण में आ सकता है. रेलवे को अपने वर्तमान ढांचे को सुधारने के लिए सतत प्रयासों की आवश्यकता है इसलिए आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए एक बार शुरू की गयी परियोजनाओं को पूरा होने तक धन आवंटन में कमी से बचाने और नयी योजनाएं लागू करने के बारे में नीतिगत निर्णय लेने की आावश्यकता भी है.
                                                यदि संभव हो तो रेलवे को इस तरह के किसी भी प्रयोग को शुरू करने से पहले देश के किसी हिस्से में केवल इस तरह के कोच बनाने वाली डेडिकेटेड रेल कोच फैक्ट्री स्थापित करने के बारे में गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि वर्तमान रेल कोच फैक्टरियों से वर्तमान ज़रुरत ही पूरी नहीं हो पा रही है. पहली बात तो रेलवे के पास अभी इस तरह के कोच उपलब्ध नहीं है इसलिए कोई भी प्रयोग बड़े स्तर पर संभव ही नहीं है इसलिए जिन ट्रेनों में सुरक्षा की दृष्टि से अभी २८ डिब्बों की सीमा तक नहीं पहुंचा गया है सबसे पहले उनको उस क्षमता तक पहुँचाने के बारे में सोचा जाना चाहिए. कोच उपलब्ध होने पर उन्हें रेल मंत्री के सुझाव के अनुसार ट्रेनों में जोड़ने का काम भी शुरू किया जाना चाहिए. वर्तमान में चल रही ट्रेनों के स्वरुप में बड़े परिवर्तनों से आम लोगों को ही परेशानी होने वाली है इसलिए यदि तकनीकी और सुरक्षा के अनुसार संभव हो तो हर ट्रेन में एक-दो डबल डेकर कुर्सी यान लगाने के बारे में सोचा जाने चाहिए. फिलहाल मज़बूत सरकार के संकल्पित मंत्री कुछ करने में सक्षम हैं इसलिए उन्हें अपने विचारों को प्रायोगिक तौर पर शुरू करने के आदेश देने चाहिए.         
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गुरुवार, 20 नवंबर 2014

पनसारी गाँव- आदर्श और विकसित

                                                                           गुजरात के साबरकांठा ज़िले के ५००० हज़ार की आबादी वाले एक छोटे से गाँव ने अपने युवा सरपंच के सपनों के साथ जिस तरह से आगे बढ़ने के संकल्प लिया आज उसके परिणामों से पूरी दुनिया के सामने ऐसा गाँव आया है जो किसी भी तरह की अनावश्यक बाहरी सहायता के साथ विकसित नहीं हुआ है. आज देश के हर ग्राम में उसी तरह से धन का आवंटन किया जाता है पर पनसारी ने जो विकास गाथा शुरू की है हेमंत पटेल की अगुवाई में वह बहुत आगे तक जाने वाली है. मात्र २३ वर्ष की उम्र में पंचायत का चुनाव जीतने वाले स्नातक हेमंत ने ग्राम सभा के लिए जिस तरह से विकास का खाका खींचा और पूरी पंचायत से उन्हें पूरा समर्थन भी मिला उसके बाद ही यह गाँव अपने आप में बड़े बड़े शहरों को भी मात देने में लगा हुआ है २०१२ में केन्या की एक टीम ने नैरोबी से आकर इसका अध्ययन किया और अपने यहाँ के गांवों में भी इसी तरह से विकास की कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिशें शुरू करने की बात की और उस पर काम भी शुरू किया.
                                             गांव में सुविधा के नाम पर जो सूची शुरू होती है वह ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती है आज वहां पर सरकारी स्कूल में एसी के साथ स्मार्ट क्लास चलती हैं जिससे इस स्कूल में बच्चों की संख्या ३०० से बढ़कर ६०० हो गयी है. गाँव का अपना वाईफाई सिस्टम है और पूरे गांव पर नज़र रखने के लिए २५ क्लोज सर्किट कैमरे भी लगे हुए हैं. इस सबसे बढ़कर गांव का अपना लोकल बस तंत्र भी है जो गांव वालों को हर तरह की सुविधा प्रदान करता है. मात्र ४ रूपये में २० लीटर पानी गांव के संयंत्र से ही बनाकर गांव वालों के लिए उपलब्ध किया जाता है जिससे पीने के पानी की समस्या भी ख़त्म हो गयी है. गांव का अपना प्रसारण तंत्र भी है जिसके लिए १२० स्थानों पर लाऊड स्पीकर लगे हुए हैं जिससे सरपंच गांव के लिए महत्वपूर्ण योजनाओं के बारे में तय समय पर जनता को बताते हैं और उनके लिए निर्देश भी जारी करते हैं. कैमरों के माध्यम से गाँव में गंदगी फ़ैलाने वालों पर भी नज़र रखी जाती है और दोषियों के लिए सजा का भी प्रावधान किया गया है.
                                        देश में जिस पंचायती राज की स्थापना का सपना महात्मा गांधी ने देखा था और उसके अनुपालन में राजीव गांधी के कार्यकाल में जिस तरह से पंचायती राज को कानून के रूप में लाया गया था उसके बाद गांवों में विकास की कहानी कुछ इस तरह की ही होनी चाहिए थी पर सरकारी स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और गांवों में बढ़ते हुए धन के आवंटन ने हर तरह से छोटे स्तर के नेताओं को गांव के बारे चुनाव के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया जिसके बाद सारे आवंटित धन की बंदरबांट शुरू हो गयी. हेमंत पटेल ने गांव को अपने दम पर ही विकसित करने का जो जज़्बा दिखाया और उस सबसे ऊपर उन्होंने गांव की भलाई के लिए जिस तरह से सोचना शुरू किया उसके बाद उन्हें गांव के लोगों का भी पूरा समर्थन मिला जिससे भी उनके हौसले में बढ़ोत्तरी हुई. काश आज पीएम द्वारा आदर्श गाँव की संकल्पना पर हमारे सांसद इस तरह से विचार करना शुरू कर सकते और तेज़ तर्रार युवा सरपंचों को पूरा सहारा देते जिससे हर ब्लॉक में कम से कम तीन चार गांव तो अपने दम पर ही हर वर्ष विकास की रफ़्तार पकड़ने की तरफ बढ़ जाते. 
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कर्म से चिकित्सक और बहुत कुछ करने की आशा के साथ जीवन की अनवरत यात्रा पर बढ़ने का क्रम जारी.....

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