मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

३१ अक्टूबर की राजनीति

                                                                    देश को अनगिनत राजनैतिक और सामजिक घाव देने वाले ३१ अक्टूबर को लेकर जिस तरह से मीडिया में इसे इंदिरा बनाम सरदार किया जा रहा है उसकी कोई आवश्यकता नहीं है. किसी भी सरकार के पास यह निर्णय लेने का पूरा अधिकार होता है कि वह पिछली सरकारों द्वारा चलायी जा रही परम्पराओं को लेकर क्या रुख अपनाती है और उसके इस रुख के पीछे भले ही किसी भी तरह की मंशा क्यों न हो पर इससे सरकार पर अनावश्यक प्रश्नचिन्ह लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता है. मोदी सरकार ने जिस तरह से इस बात का निर्णय ले लिया है कि आने वाले समय में सरकारी खर्चे पर केवल महात्मा गांधी की जन्म और पुण्यतिथि का आयोजन करेगी उसे किसी भी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता है. आज़ादी के बाद जिस तरह से सातवें दशक में हम पहुँच चुके हैं तो अब पूर्व नेताओं की सूची भी लम्बी होती जा रही है जिससे सरकार के लिए इसे करना उतना आसान भी नहीं होने वाला है इसलिए इस मामले को राजनैतिक स्वरुप देने की कोई आवश्यकता भी नहीं है.
                                                          जिस तरह से यह बात भी सामने आई है कि दो वर्ष पहले ही सोनिया गांधी ने इस तरह का प्रस्ताव मनमोहन सरकार को दिया था जिसमें यह कहा गया था कि महापुरुषों से सम्बंधित कार्यक्रमों को संचालित करने के लिए सम्बधित ट्रस्टों, राजनैतिक दलों और सोसाइटियों पर ही यह ज़िम्मा छोड़ दिया जाये और सरकारी स्तर पर केवल महात्मा गांधी से जुडी तिथियों को ही मनाया जाये. यदि आज मोदी सरकार इस तरह का निर्णय लेती है तो उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए. इन गैर सरकारी समूहों द्वारा मनाई जा रही इन तिथियों में से किस जगह जाना है यह सरकार चला रहे दल और पीएम पर निर्भर करता है. देश के पूर्ववर्ती नेताओं के सम्मान में कौन कहाँ तक जाना चाहता है यह तो आज के नेताओं को ही सोचना है और किसी भी जगह पर किसी को जबरिया बुलाया भी नहीं जा सकता है. सरकारी स्तर पर जिस तरह से संसद के केंद्रीय हाल में लगे चित्रों पर पुष्प चढ़ाये जाते हैं सरकार की तरफ से उतना करना ही काफी मान लिया जाना चाहिए.
                                                         ३१ अक्टूबर ८४ से पहले भी आती थी और सरकारी स्तर पर वल्लभ भाई पटेल की जयंती भी मनाई जाती थी पर इस तिथि को ही इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से ही हर सरकार का ध्यान पूरी तरह से उनकी पुण्यतिथि से जुड़े हुए कार्यक्रमों की तरफ होने लगा जिससे सरदार से सम्बंधित कार्यक्रम नेपथ्य में चले गए. ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने कभी उनकी याद भी नहीं की हो पर दिल्ली की राजनीति ने अपने अनुसार बदलाव करते हुए रास्ते खोज लिए थे. मोदी सरकार किसी भी नेता के जन्म या पुण्य तिथि को सरकारी खर्चे पर तो नहीं मानना चाहती है पर सरदार के जन्म पर वह दिल्ली में सरकारी खर्चे पर आयोजन करने से नहीं चूक रही है तो इस बात के राजनैतिक हित निकाले जा सकते हैं. सरकार को यदि कुछ करना है तो फिर समग्र रूप से ही उसे करने के बारे में सोचा जाना चाहिए न कि किसी दल विशेष के उन नेताओं प्रति इस तरह का प्रदर्शन करना चाहिए जो अपने काल में लम्बे समय तक देश की बागडोर संभाल चुके हों.     
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गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

सुप्रीम कोर्ट और काला धन

                                                             काले धन पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दो दिन पहले फटकार लगायी थी उसके बाद यह लगने लगा था कि इस मामला का हश्र भी कोयला आवंटन जैसा होने वाला है जिसमें सरकार की कोशिशों के बाद भी कुछ ब्लॉक्स छोड़कर सभी के आवंटन को रद्द कर दिया गया था और लगभग इसी तरह का रुख सुप्रीम कोर्ट ने २ जी मामले में भी अपनाया था जिसके बाद १२२ सर्किलों में स्पेक्ट्रम का आवंटन रद्द किया गया था. काले धन मामले में अभी तक कोर्ट ने जिस तरह से सरकार पर अंकुश लगाने का काम किया था उसे देखते हुए संभवतः उसे सरकार की मंशा पर कुछ संदेह हुआ होगा क्योंकि सरकार बार बार यह कह रही थी कि उसने सूचना में मिले सारे नाम एसआईटी को सौंप दिए हैं पर कोसर्ट ने इस बात पर अधिक ज़ोर दिया कि सरकार उन नामों को सील बंद लिफाफे में कोर्ट में प्रस्तुत करे जिससे मामले को आगे बढ़ाया जा सके.
                                                           कोर्ट की नाराज़गी के बाद ऐसा लगने लगा था कि कोर्ट में सरकार द्वारा दी जाने वाली सूची अब गोपनीय नहीं रह जाएगी इसलिए सरकार की तरफ से कहा जा रहा था कि इस मामले में विदेशों से जो सन्धियां की गयी हैं उन पर उर असर पड़ सकता है पर कोर्ट ने इस मामले में सरकार की कोई बात नहीं सुनी और स्पष्ट कर दिया था कि सरकार को उन संधियों की चिंता करने की ज़रुरत नहीं है और सूची कोर्ट में आने के बाद ही यह तय किया जायेगा कि उसका क्या करना है. सरकार को यहाँ पर कोर्ट पर संदेह हो रहा था कि कहीं यह सूची सार्वजनिक हो गयी तो इससे काले धन के पूरे मामले पर सही बात कभी भी पता नहीं चल पायेगी पर कोर्ट ने यह सूची एसआईटी को सौंप दी. कोर्ट ने यह काम सिर्फ इसलिए ही तो नहीं किया कि उसे कहीं से इस बात का अंदेशा हो गया कि सरकार सूची में शामिल नामों को अपने राजनैतिक हितों को साधने के लिए उपयोग में लाना चाहती है क्योंकि वित्त मंत्री जिस तरह से विपक्षी दल को शर्मिंदगी उठाने की बातें कहने लगे थे तो इसमें भी राजनीति का समावेश तो हो ही गया था.
                                                          अब इस सूची को कोर्ट के माध्यम से दोबारा एसआईटी को सौंपे जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार के पास इस बात के विकल्प खत्म हो गए हैं कि वह अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर रिपोर्ट का राजनैतिक दुरूपयोग कर सके. यह मामला जिस तरह से आगे बढ़ रह है और इसकी कानूनी पेचीदगियों के चलते जो धीमी गति ही रहने वाली है उसे भी देखते हुए देश में कुछ भी वापस लौटने की सम्भावना नहीं है क्योंकि जिन भारतीय नागरिकों का धन वहाँ पर जमा था या है वे इसे हटाने की कोशिशें भी शुरू कर चुके होंगें तथा प्रवासी भारतीयों पर यह कानून लागू नहीं होते हैं. इस मामले को तेज़ी से सुनवाई तक पहुंचा कर इस मुद्दे को खत्म किया जाना बहुत आवश्यक है क्योंकि यह अपने आप में बड़े मुद्दे के रूप में सामने आ गया है तथा इसको सही परिणिति तक पहुंचना भी चाहिए जिससे आने वाले समय में कानून को मज़बूत कर काले धन पर अंकुश लगाने की कोशिशों को सही दिशा देने में सफलता मिल सके.    
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कर्म से चिकित्सक और बहुत कुछ करने की आशा के साथ जीवन की अनवरत यात्रा पर बढ़ने का क्रम जारी.....

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