मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 28 जुलाई 2014

मुंबई और आतंकी धमकी

                                         मुंबई के पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया को भेजे गए एक पत्र में इंडियन मुजाहिदीन ने धमकी देते हुए कहा है कि १९९३ की तरह एक बार फिर से हमले किये जायेंगें और इस बार मुंबई की किस्मत पहले जैसी अच्छी नहीं होगी. इस पत्र के मिलने के बाद से ही मुंबई पुलिस ने अपने सभी एंटी टेरर सेल्स को एक बार फिर से पूरी तरह एक्टिव कर दिया है पर पुलिस खुलेतौर पर इस मसले पर कुछ भी बोलने से पूरी तरह बच रही है. अभी पुलिस का ध्यान इस पत्र की सत्यता की जांच करना और मुंबई में सुरक्षा प्रबंधों को मज़बूत करने की तरफ ही अधिक है. इस पत्र में जिस तरह से यह भी कहा गया है कि वे लोग ग़ाज़ा में हो रहे हमलों का बदला लेने की पूरी कोशिश करेंगें तो उससे उनके वैश्विक संपर्कों और मन्सूबों का भी पता चलता है क्योंकि इस तरह की बात करने के लिए किसी भी आतंकी संगठन के पास स्लीपिंग मॉड्यूल का पूरा स्थानीय तंत्र होना भी आवश्यक है.
                                        देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हमला कर आतंकी पूरी दुनिया के सामने यह प्रदर्शित करना चाहते हैं कि वे जब और जहाँ चाहें भारत में हमले करने की क्षमता रखते हैं और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र होने के कारण भी वहां पर हमले करने से उसके परिणाम सांकेतिक काम और दूरगामी अधिक हो जाते हैं. हालाँकि २६/११ के बाद से अभी तक आतंकियों ने देश में कोई बड़ा हमला करने की कोशिश भी नहीं की है फिर भी उनकी तरफ से लगातार खतरा तो बना ही रहता है. इस तरह से भेजा गया कोई भी पत्र जो पुलिस को सीधे ही मिला हो उस पर जांच और आवश्यक कार्यवाही करना ज़रूरी होता है. वैसे भी अब मुंबई पुलिस पहले से अधिक प्रभावी और सतर्क रहने वाले पुलिस बलों में शामिल है और किसी भी परिस्थिति में वहां पर बड़ी आतंकी घटना को अंजाम दे पाना इतना आसान नहीं होने वाला है.
                                        पत्र भेजने वालों ने जिस तरह से इस संभावित हमले को ग़ाज़ा से जोड़ने की कोशिश की है उससे यही लगता है कि वे वहां पर चल रहे संघर्ष को लेकर भारतीय मुसलमानों की सहानुभूति को भी पाना चाहते हैं क्योंकि इस हमले को वे दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाले मुसलमानों पर हमलों से जोड़ने में सफल भी हो सकते हैं. भारतीय मुसलमानों के मन भी गाज़ा को लेकर आक्रोश है और संभवतः उनके मन को भाँपने के लिए ही आईएम ने या किसी ने उसके नाम से इस तरह के पत्र को भेजने का काम किया है. इस परिस्थिति में जब भारतीय समाज में हिन्दू मुस्लिम एक साथ ही रहा करते हैं तो किसी भी आतंकी हमले में मरने वाले मुस्लिम भी होते ही हैं. अब पुलिस को जो कुछ भी करना है वह अपने स्तर से करती ही रहेगी पर जागरूक नागरिक होने के नाते हम सभी को अपने आसपास होने वाली सभी संदिग्ध और अलग तरह की गतिविधियों पर नज़र रखनी ही होगी. हम सजग रहकर पुलिस की बहुत मदद तो कर ही सकते हैं साथ ही अपने मोहल्ले, शहर और राष्ट्र को भी सुरक्षित रखने में अपना योगदान भी कर सकते हैं.        मुंबई और आतंकी धमकी
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रविवार, 27 जुलाई 2014

यूपी फिर अस्सी के दशक में

                                                                     सहारनपुर की घटना के बाद यूपी में एक बार फिर से वही सब होता दिख रहा है जिसके लिए कभी वह जाना जाता था और आज हर शहर और गाँव में किस तरह से लगातार तनाव बढ़ता ही जा रहा है इस पर भी खुद समाज को कुछ करने की आवश्यकता है. हिंसाग्रस्त कोई भी क्षेत्र हो पर हर जगह पुलिस और प्रशासन की अक्षमता या ऊपर के अघोषित निर्देशों के चलते ही हालात बेकाबू हो जाते हैं और उसके बाद अजीब तरह से बयानबाज़ी भी शुरू कर दी जाती है जो किसी भी तरह से मामले को शांत करने के स्थान पर अराजकता की तरफ ही ले जाती है. सहारनपुर में विवादित स्थल के बारे में हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद भी प्रशासन ने जिस तरह से लापरवाही की वैसी मिसाल कहीं और नहीं मिल सकती है क्योंकि जब इस जगह पर मामला इतना संवेदनशील था तो आदेश के बाद सरकार और प्रशासन को दोनों पक्षों को बैठाकर आगे की रणनीति बनानी चाहिए थी पर इसमें वह पूरी तरह से फेल ही रहा.
                                                                  सरकार एक तरफ मलाला के नाम पर पूरे प्रदेश में महिलाओं को सम्मान देने की बात करती है पर केवल जैसी घटनाएँ पूरे प्रदेश के हर नुक्कड़ पर घटती रहती हैं तो क्या स्थानीय पुलिस प्रशासन को यह काम प्राथमिकता में नहीं लेना चाहिए जिससे छेड़छाड़ जैसी घटनाएं भी सांप्रदायिक रूप न लेने पाएं ? नॉएडा में एक सब्ज़ी वाले द्वारा दस वर्ष की लड़की को छेड़े जाने पर कल ही विवाद हुआ है तो सरकार महिलाओं के लिए क्या कर रही है और क्या उसका सन्देश अधिकारियों तक पहुँच भी पा रहा है या नहीं ? अखिलेश के युवा होने से जहाँ उनसे जनता को बहुत उम्मीदें थीं वहीं उन्होंने कुछ मामलों में कड़े निर्णय कभी भी नहीं लिए और हर बार सरकार को नीचा ही देखना पड़ा है. क्या कारण है कि पूरे यूपी से सफाया होने के बाद भी सपा कानून व्यवस्था को आज भी पानी प्राथमिकता में नहीं ले पायी है और महिलाओं के खलाफ अत्याचार के साथ सांप्रदायिक संघर्षों की बाढ़ आती जा रही है ?
                                                                   प्रदेश में बसपा सरकार ही समय भी इस तरह की बातें होती थीं पर सरकार कभी भी पूरी तरह से गायब नहीं दिखाई दी और इन्हीं अधिकारीयों के भरोसे कानून व्यवस्था को आज की स्थिति से अच्छी तरह से संभाला गया था. सहारनपुर में भी जिस तरह से डीएम और एसपी लखनऊ से निर्देशों का इंतज़ार करते रहे और उनके सामने ही दंगाइयों ने फायर ब्रिगेड और पुलिस चौकी को भी आग के हवाले कर दिया गया उससे उनकी प्रशासनिक क्षमताओं का ही पता चलता है इन लोगों क वहां से अविलम्ब हटाया भी जाना चाहिए क्योंकि जो लोग इतने ढीले तेवरों के साथ उग्र भीड़ में जायेंगें तो उनकी जान भी खतरे में हो सकती है और सरकार को एक और शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है. आगज़नी पर आठ घंटे तक प्रशासन कुछ भी न कर पाये तो ऐसे लोगों को ज़िले का चार्ज क्यों दिया जाना चाहिए इस तरह से हर बार ही जिला स्तरीय अधिकारी पूरी तरह से नाकाम साबित होते रहे हैं और प्रदेश वैमनस्यता की आग में सुलगता ही रह जाता है.  
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कर्म से चिकित्सक और बहुत कुछ करने की आशा के साथ जीवन की अनवरत यात्रा पर बढ़ने का क्रम जारी.....

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