मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 29 July 2015

मेमन - कानून सजा और अमल

                                                                                                                    १९९३ मुंबई धमाकों के सह अभियुक्त बनाये गए याकूब मेमन की फांसी को लेकर जिस तरह से देश में माहौल बन रहा है उससे निपटने के लिए क्या देश के पास कोई मज़बूत विकल्प हैं या फिर इसी तरह से देश की सुरक्षा से जुड़े हुए महत्वपूर्ण मामलों में भी राजनैतिक रोटियां सेंकने के काम करने के लिए अब राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र के लोगों को इस्तेमाल करने की एक गलत परंपरा की तरफ हम बढ़ने ही वाले हैं. कानून का यही कहना है कि भले ही कुछ दोषी छूट जाएँ पर किसी भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए तो क्या याकूब मेमन या अन्य आतंकी गतिविधियों में शामिल लोगों की धर्म के आधार पर पैरवी या विरोध करने को सही कहा जा सकता है ? मेमन का मामला इस लिए भी अधिक संवेदनशील हो जाता है क्योंकि आज देश के बहुत से हिस्सों में न्याय व्यवस्था से जुड़े हुए लोग भी उनकी सजा में अपनायी गयी प्रक्रिया में तकनीकी खामियों की बात करने लगे हैं जिसमें ऐसा नहीं है कि केवल मुस्लिम नेताओं या बुद्धिजीवियों की राय ही शामिल है क्योंकि बहुत सारे अन्य लोग भी इसी तरह के विचार रखते हैं. पुनरीक्षण याचिका पर दोनों जजों में मतभेद होने के कारण अब मामला सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच के सामने जा चूका है तो इस पर सभी को सामाजिक दबाव और राजनीति करने से बचना भी चाहिए.
                                            देश में आतंक और सामाजिक अन्याय के खिलाफ मज़बूत व्यवस्था होनी ही चाहिए क्योंकि आज अगर यह स्थिति बन रही है तो इसका दोष केवल व्यवस्था और राजनेताओं पर ही नहीं छोड़ा जा सकता है. देश में नेताओं की सदैव से ही यही नीति रही है कि आवश्यकता पड़ने पर वे किसी भी तरफ झुककर अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति करने से पीछे नहीं हटते हैं. आखिर क्या कारण हैं कि जिन लोगों को आतंकी गतिविधियों में शामिल बताकर जेलों में डाला जाता है उनके खिलाफ हमारी एजेंसियां मज़बूत सबूत नहीं ला पाती हैं जिससे हमारी अभियोजन की कमज़ोर प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है. क्या सरकार के पास जारी करने लायक ऐसे कोई आंकड़े हैं जिनमें यह बात सामने आ सके की जिन लोगों को किसी संदिग्ध आतंकी कारणों से पकड़ा गया था क्या उनके खिलाफ राज्यों की पुलिस और अभियोजन पक्ष ने मज़बूती से पैरवी करने के बारे में कभी सोचा भी था ? फांसी की तारिख तय हो जाने के बाद इस तरह की बातें केवल समाज को बाँटने के काम ही किया करती हैं क्योंकि समाज में हर समय ऐसे तत्व भी मौजूद ही रहा करते हैं जो इस तरह की घटनाओं में भी अपने राजनीतिक स्वार्थों को पूरा करने की तरफ बढ़ना शुरु कर ही देते हैं.
                                    सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ में अब जो भी निर्णय सामने आये वह एक बात है पर क्या अब इस मामले के बहाने हम अपने देश की इस सबसे बड़ी कमी को दूर करने के बारे में कड़े कदम उठाने की तरफ बढ़ना भी चाहते हैं या इस विवाद के समाप्त होने के बाद फिर से हमारी ज़िंदगी फिर से उसी पुराने ढर्रे पर लौटने वाली है ? आज याकूब मेमन दो पक्षों के बीच एक मोहरे से अधिक कुछ भी नहीं दिख रहा है और हमारे कानून में कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे यह पता चल सके कि अब देश इस तरह से किसी भी मामले को निपटाने की मानसिकता से बाहर आ चुका है. कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए पुलिस और कोर्ट की आवश्यकता सदैव ही रहने वाली है पर अब हमें इस व्यवस्था की गति को सुधारने और किसी भी हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ सबूत न मिल पाने की दशा में अपनी गलती सुधारते हुए उसे सम्मान सहित रिहा करने के बारे में भी सोचना चाहिए. आरोप तो किसी पर भी लग सकते हैं पर उनको साबित करने की भी कोई समय सीमा तो देश में होनी ही चाहिए जिससे समय रहते उसको निर्दोष साबित होने पर अपनी ज़िंदगी को सुधारने का अवसर भी मिल सके. इस तरह के मामलों को त्वरित कोर्ट्स में भेजने की मज़बूत व्यवस्था होनी चाहिए और पुलिस को भी वहां पर तेज़ी के साथ काम करने की हिदायत भी होनी चाहिए जिससे आने वाले समय में इस तरह की घटिया राजनीति फिर से न दिखाई दे.            
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Tuesday, 28 July 2015

दीनानगर के छिपे सन्देश

                                                   आतंकी घटना में पंजाब के तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह को आत्मघाती हमले में शहीद करने के बाद पंजाब में दो दशक बाद आतंक का इतना बड़ा स्वरुप गुरदासपुर जिले में देखने को मिला है जिसकी कल्पना ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ संभवतः राज्य और केंद्र सरकारों ने भी नहीं की थी क्योंकि पंजाब में आतंक के चेहरे को पूरी तरह से नष्ट करने के बाद से अब तक इस तरह की कोई घटना भी नहीं हुई थी. देश के नेताओं में इस तरह की परिस्थितयों में भी अपने को बचाने की जो प्रवृत्ति सदैव से ही हावी रहा करती है कल पूरे दिन चले ऑपरेशन में एक बार फिर से प्रभावी दिखी जब पंजाब पुलिस की तरफ से इस पूरे अभियान को अपने दम पर चलाने की बात कही गयी. निश्चित तौर पर पंजाब की कमांडो टीम ने बहुत अच्छा काम किया और उन्होंने अपनी ट्रेनिंग को भी सार्थक कर दिखाया है पर इस तरह के अभियानों में शामिल होने वाली पंजाब पुलिस की वो पीढ़ी अब पूरी तरह से परिदृश्य से गायब है संभवतः इस बात का ख्याल पंजाब ने नहीं रखा और कुछ चूकें ऐसी भी हुईं जिसके माध्यम से हमारे जवानों की बेशकीमती जानें भी चली गयीं जिन्हें अधिक कुशलता के साथ काम करके बचाया जा सकता था.
                            कुछ हद तक पंजाब पुलिस का अपने दम पर अभियान चलाने का निर्णय सही भी था क्योंकि वह अपनी इस नयी बनी यूनिट की कुशलता का परीक्षण भी करना चाहता था पर इस तरह के हमलावरों से निपटने के लिए एनएसजी और सेना को जितने बड़े पैमाने पर महारत हासिल है यदि उनके साथ पूरे समन्वय को बनाये रखते हुए अभियान चलाया जाता तो पंजाब पुलिस को इस हमले से बहुत कुछ और भी सीखने को मिल जाता. पर अब जब उस स्तर पर चूक हो चुकी है तो उस पर विचार करते हुए भविष्य में होने वाली ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर एक नीति बनायीं जानी चाहिए जैसा कि खुद पंजाब के सीएम की तरफ से कल कहा भी गया है. राज्य चाहकर भी आतंक से उतनी मज़बूती से नहीं निपट सकते हैं जैसे केंद्रीय एजेंसियां कर सकती है क्योंकि उनके पास पूरे देश के अलग अलग हिस्सों में विभिन्न तरह के आतंकवादियों से निपटने के लिए अधिक अनुभव है जिसको पूरे देश की पुलिस और राज्यों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ साझा किया जाना आवश्यक भी है.
                        देश के किसी भी हिस्से में आतंकवादियों से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय नीति को बनाये जाने की आवश्यकता अब महसूस होने लगी है क्योंकि इस तरह की परिस्थिति में राज्यों द्वारा केंद्रीय एजेंसियों को किस हद तक किसी भी ऑपरेशन से मना किया जा सकता है यह सोचने का विषय है. राज्यों और केंद्र की एजेंसियों के बीच अब बेहतर समन्वय की भी आवश्यकता है क्योंकि जब तक पूरे देश में आतंक से लड़ने की स्पष्ट नीति नहीं होगी तब तक राज्यों की ज़िद के चलते इस तरह से जनहानि होने से हम नहीं बच सकते है. आतंकियों के हमला करने के पसंदीदा स्थलों में सुरक्षा बलों के ठिकाने ही रहा करते हैं यह जानते हुए भी पाक की ज्वलंत सीमा से केवल १५ किमी अंदर स्थित दीनानगर में पुलिस के पास आधुनिक हथियार ही नहीं थे और वे एके ४७ का मुक़ाबला पुरानी एसएलआर से करने को मजबूर थे. पुलिस के पास मनोबल की कमी नहीं थी पर जिस तरह से उसके पास योजना और संसाधन में कमी दिखी वह अवश्य ही चिंता की बात है. आतंकी इन स्थानों को अपने हमले में लेकर यह सन्देश देना चाहते हैं कि जनता की सुरक्षा करने वाले सुरक्षा बल भी उनकी आसान पहुंच में हैं और अब पूरे देश तथा विशेषकर सीमावर्ती राज्यों में पुलिस को एक राष्ट्रीय अभियान के तहत आधुनिकीकृत किया जाना चाहिए.     
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