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Thursday, 18 December 2014

शी टैक्सी और केरल सरकार

                                                  देश की मुख्य धारा के मीडिया के पास संभवतः इतना समय ही नहीं है कि वह चुप-चाप सामाजिक परिवर्तन और महिलाओं को सुरक्षा का सही एहसास दिलाने वाली केरल की शी टैक्सी के बारे में लोगों और देश के अन्य राज्यों की सरकारों को जागरूक कर सकें. दिल्ली में उबर टैक्सी के घटनाक्रम के बाद एक बार फिर से टैक्सियों में महिलाओं की सुरक्षा की चिंताएं सामने आने लगी है क्योंकि अभी तक यह माना जाता था कि नेटवर्क से जुड़े होने के कारण इस तरह की टैक्सी सर्विस में महिलाओं को अधिक सुरक्षा दी जा सकती है पर इस घटना ने एक बार इस तंत्र की खामियों को भी सबके सामने लेकर खड़ा कर दिया है. १९ नवम्बर २०१३ को केरळ सरकार के सामाजिक न्याय विभाग ने एक पहल कर जेंडर पार्क नामक एनजीओ के साथ मिलकर शी टैक्सी कि शुरुवात की गयी थी और अब इसकी सफलता सुरक्षा स्तर को देखते हुए सरकार ने इसे कोच्चि में भी शुरू करने के बारे में सोचना शुरू कर दिया है तथा अब इसकी जानकारी होने पर अन्य राज्यों द्वारा भी इसमें दिलचस्पी दिखाई जा रही है.
                                                 हर काम सरकार के माध्यम से कर पाना हमारे देश में बहुत ही मुश्किल काम है फिर भी प्रायोगिक तौर पर जिस तरह से शी टैक्सी की अवधारणा को बनाया और शुरू किया गया है वह अपने आप में लाजवाब है. इसमें प्रयुक्त होने वाली टैक्सी की चालक भी महिला ही होती है और सुरक्षा को देखते हुए हर टैक्सी में जीपीएस मॉनिटरिंग सिस्टम लगा हुआ है जिसे माध्यम से किसी टैक्सी विशेष में यात्रा कर रही महिला के बारे में लाइव जानकारी किसी भी सम्बंधित व्यक्ति द्वारा प्राप्त की जा सकती है. किसी भी तरह की आपातकालीन परिस्थिति के लिए हर टैक्सी में चालक और यात्री के लिए अलग अलग पैनिक बटन लगाया गया है जिसे दबाने पर उस क्षेत्र की पुलिस पिकेट को इसकी जानकारी मिल जाती है साथ ही केंद्रीय सिस्टम भी इस अलर्ट पर सक्रिय होकर सहायता पहुँचाने की तरफ तुरंत ही काम करना शुरू कर देता है. केरळ सरकार की महिला सुरक्षा की प्राथमिकता होने के कारण पुलिस को भी इस सिस्टम से जुडी किसी भी कॉल को प्राथमिकता से देखने के आदेश भी दिए गए हैं.
                             यदि समस्या की जड़ तक पहुँचने की कोशिश की जाये तो इस तरह की समस्याएं कहीं भी सामने आ सकती हैं पर सेवा शुरू होने के एक वर्ष पूरा होने के बाद भी जिस तरह से केंद्र या राज्य स्तर पर इस तरह की पहल को आगे बढ़ाने के बारे में नहीं सोचा जा रहा है उससे क्या महिलाओं की सुरक्षा प्रभावित नहीं हो रही है ? किसी भी अच्छे और प्रभावी ढंग से चल रहे तंत्र को चलाये रखने और उसके प्रचार से सभी को लाभ देने की तरफ अभी तक कोई कदम बढ़ाये नहीं जा सके है कई बार स्थानीय राजनीति के चलते भी अन्य दलों की सरकारें भी इस तरह के प्रयासों को शुरू नहीं करना चाहती हैं क्योंकि इसमें पहल का श्रेय उनको नहीं मिलता है. अब केंद्रीय स्तर पर कोई ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए जिससे देश के हर राज्य के बड़े शहरों में इस तरह की सेवा का सञ्चालन शुरू किया जा सके तथा जिन शहरों में हवाई अड्डे हैं वहां पर महिलाओं के आने जाने के लिए हवाई अड्डे से भी इस तरह की सेवा को आवश्यक रूप से संचालित किया जाना चाहिए तभी महिलाओं के बारे में सुरक्षा के एहसास को और भी मज़बूत किया जा सकेगा.         
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कर्म से चिकित्सक और बहुत कुछ करने की आशा के साथ जीवन की अनवरत यात्रा पर बढ़ने का क्रम जारी.....