मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 2 May 2016

उज्ज्वला योजना और भ्रष्टाचार

                                                   देश में सब्सिडी छोड़ने वाले लोगों के कारण होने वाली बचत को गरीबों के एलपीजी चूल्हे जलाने के लिए उपयोग किये जाने का वायदा पूरा करते हुए जिस तरह से पीएम मोदी ने बलिया से इसका शुभारम्भ किया वह अपने आप में गरीबों के चूल्हे के लिए एक लिए बड़ा वरदान भी बन सकती है. देश में पहले से ही गरीबों के लिए विभिन्न स्तरों पर कई प्रकार के आर्थिक सामाजिक सहायता के कार्यक्रम केंद्र और राज्य सरकारों के माध्यम से लगातार चलाये जा रहे हैं पर उनका अभी तक धरातल पर जितना प्रभाव दिखाई देना चाहिए था आज भी गरीब उसके लिए प्रतीक्षारत ही हैं तथा इन योजनाओं में लगातार हज़ारों करोड़ की धनराशि को डाला जा रहा है पर इनके लाभ को गलत आंकड़ों और चयन में अनियमितता करने के चलते सही लोगों तक पहुँचाने की कोई कारगर व्यवस्था भी नहीं बन पा रही है. देश के उन संसाधनों पर अपात्रों द्वारा लगातार अनाधिकृत रूप से अधिकार जमाया जा रहा है जिसके लिए वे कहीं से भी पात्र नहीं हैं और इसका सीधा असर गरीबों की स्थिति पर ही पड़ रहा है क्योंकि उनके हिस्से की योजनाएं भ्रष्टाचार के कारण लगातार गलत हाथों में जा रही हैं.
                                     आज भी जिस तरह से गरीबी रेखा, गरीबों, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े नागरिकों के चयन के जो मानदंड बने हुए हैं वही इस तरह की योजनाओं की सफलता में सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आ रहे हैं क्योंकि इनका चयन करने के लिए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जिस तरह से निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों का उपयोग किया जाता है तो वे उस पूरी प्रक्रिया को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं और किस हद तक पात्र परिवार छूट जाते हैं तथा अपात्रों को घूस तथा राजनैतिक दबाव के चलते इन सुविधाओं के लिए योग्य घोषित कर दिया जाता है यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है. क्या आज देश को केंद्रीय स्तर पर एक ऐसे कानून की आवश्यकता नहीं है जिसमें विभिन्न योजनाओं के लिए सही लाभार्थियों के चयन के लिए ही एक विशेष अभियान चलाया जाये और एक बार सही तरह से समय देकर सही लोगों का चयन भी किया जाए जिससे विभिन्न योजनाओं के लिए चयन के मानकों का हर बार उल्लंघन करके अपात्रों को आगे न बढ़ा दिया जाये. निश्चित तौर पर इस तरह के प्रयास का राज्यों की तरफ से विरोध होगा क्योंकि उनके छोटे स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं आदि के लिए ऐसी योजनाएं सदैव ही करीबी लोगों को सहायता दिलवा कर अपनी राजनीति को चमकाने का अंग रहा करती हैं.
                                      चयन की प्रक्रिया को केवल सरकारी स्तर पर किये जाने के स्थान पर लाभार्थियों के स्तर से भी शपथ पत्र लेने की नयी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए क्योंकि जब तक लाभार्थियों को इससे सीधे नहीं जोड़ा जायेगा तब तक किसी भी तरह से इस स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता है. शपथ पत्र दिए जाने के साथ ही गलत जानकारी देने पर दण्डात्मक कार्यवाही का प्रावधान भी होना चाहिए जिसमें अगले १० वर्षों तक हर स्तर पर मताधिकार और किसी भी तरह की अन्य सरकारी सहायता और सुविधा से गलत जानकारी देने वाले परिवार को पूरी तरह से वंचित कर दिया जाना चाहिए. सरकार जब ज़िम्मेदारी से योजनाएं बना रही है तो जनता के स्तर पर भी ज़िम्मेदार भागीदारी की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे सहायता की धनराशि का सदुपयोग हो सके तथा वह उन लोगों तक प्रचुर मात्रा में पहुँच भी सके जिन्हें इसकी बहुत आवश्यकता भी है. बिना इस तरह का परिवर्तन किये उज्ज्वला योजना भी कुछ हद तक ही वंचितों की मदद कर पाने में सफल होगी क्योंकि निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से निपटे बिना कितनी भी अच्छी योजना का बुरा हाल कर देने के लिए हम नागरिक और हमारा सरकारी तंत्र सदैव ही तैयार बैठे रहते हैं.   
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Sunday, 1 May 2016

पदोन्नति और आरक्षण

                                                                   आरक्षण को लेकर आज़ादी के एक दशक बाद से ही जिस तरह से वास्तविक समस्या के स्थान पर राजनीति ने मज़बूती से अपने पैर जमा लिए हैं उसके चलते आज पूरे देश में आरक्षण के नाम पर राजनीति को ही महत्व दिया जाने लगा है. आज देश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के कारण कम स्थान पाने के चलते विभिन्न राज्यों में इसको लेकर आंदोलन किये जा रहे हैं जिससे कानून व्यवस्था के साथ सामाजिक स्तर पर भी समस्याएं भी उत्पन्न हो रही हैं. पिछले कुछ वर्षों में यूपी में पदोन्नति में आरक्षण को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी गयी और सुप्रीम कोर्ट से आये निर्णय के बाद विभिन्न विभागों में पदोन्नति में आरक्षण का लाभ पाने वाले लोगों को पदावनत भी किया गया क्या उसके बाद इस मुद्दे पर राजनीति करने वालों को कुछ समझ नहीं आना चाहिए ? मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी इसी मुद्दे पर २० से अधिक याचिकाओं की सुनवाई करते हुए पदोन्नति में आरक्षण को पूरी तरह से गलत माना और २००२ के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके चलते ऐसी व्यवस्था करने की बात मध्य प्रदेश सरकार ने की थी. चिंता की बात यह भी है कि इसी तरह के मुद्दे पर यूपी सरकार के खिलाफ निर्णय आने के बाद भी केवल राजनीति के चलते अब एमपी सरकार भी सुप्रीम कोर्ट में जाने की बात कह रही है.
                                                   सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ यह स्पष्ट कर दिया है कि एक बार नौकरी मिलते समय आरक्षण का लाभ पाने वाले किसी भी व्यक्ति को पदोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता है और भोपाल हाई कोर्ट ने भी उसी बात की पुष्टि करते हुए यह निर्णय सुनाया है फिर भी एमपी सरकार केवल अपने को आरक्षण हितैषी साबित करने के लिए आगे बढ़ना चाहती जबकि उसे इस बात का एहसास भी है कि उसकी याचिका का क्या हश्र होने वाला है. अच्छा हो कि इस मुद्दे पर देश के सभी राजनैतिक दल साथ में बैठकर कोई सर्वमान्य हल निकालने की गम्भीर कोशिश करें क्योंकि जब तक राजनेताओं की तरफ से हर बात का वोटबैंक के आधार पर समर्थन किया जाता रहेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में देश और वंचितों का सही तरह से भला नहीं हो सकता है. बेशक आरक्षण से समाज के वंचित वर्गों को आगे बढ़ाने में सफलता मिली है पर पिछले सात दशकों में क्या यह आरक्षण केवल क्रीमी लेयर तक ही नहीं सिमट गया है और उससे पूरे वंचित समाज का क्या भला हो रहा है यह आज कोई देखना भी नहीं चाहता है.
                                               देश में आरक्षण एक दोधारी तलवार की तरह हो चुका है जिसे निपटना अब विधायिका के बस में नहीं रह गया है इसलिए नेता अपनी आरक्षण समर्थक या विरोधी छवि से बचने के लिए हर बात का निर्णय कोर्ट पर ही छोड़ देते हैं जिससे किसी एक पक्ष के नाराज़ होने की सम्भावनाएं भी समाप्त हो जाएँ. इस पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह बात भी है कि अपने मुताबिक निर्णय न आने पर विधायिका संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से कोर्ट के निर्णय को पलटने से भी नहीं चूकती है. यदि नेताओं और संसद के पास आरक्षण पर कोई नीति बनाने की क्षमता नहीं बची है तो उन्हें इस सत्य को स्वीकार करते हुए पूरा मामला एक संवैधानिक पीठ के सुपुर्द कर देना चाहिए जहाँ सभी पक्ष अपनी बात भी रख सकते हैं और पीठ द्वारा सबकी बातें सुनने के बाद अपना निर्णय देना आसान भी हो सकता है. कोर्ट के निर्देश के बाद किसी के लिए भी उसके खिलाफ जाना उतना आसान नहीं होने वाला है. देश के वंचितों को आरक्षण के नाम पर एक मज़बूत विकल्प मिलना ही चाहिए पर उसमें हर तरह की राजनीति को खोजने वाले नेताओं के लिए किसी भी तरह का लाभ उठाने की सम्भावनाएं भी नहीं होनी चाहिए अब इस बात की व्यवस्था करना भी आवश्यक है क्योंकि इतने बड़े मुद्दे पर एक दूसरे के पाले में समस्या को धकेलने से देश का ही नुकसान होने वाला है.
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