मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

सहयोग की सामाजिक राजनीति

                                                                                    देश के कई समाचार पत्रों ने उत्तराखंड सरकार के आह्वाहन पर योगगुरु स्वामी रामदेव के बाबा केदारनाथ मंदिर पुनरुद्धार के समीक्षा कार्यक्रम और पूजन में शामिल होने की खबर को इस तरह से छापा जैसे दोनों का मिलना कोई बहुत बड़ी घटना हो. इन अख़बारों को यह लगता था कि जिस तरह से स्वामी रामदेव ने पिछले आम चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ खुलेआम बगावत का झंडा उठाते हुए मोदी को पीएम बनाने के लिए पूरे देश का भ्रमण किया था उसके बाद किसी भी कांग्रेसी नेता या सरकार के साथ उनके सम्बन्ध सामान्य नहीं हो सकते हैं पर उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत ने जिस तरह से दोनों तरफ की जमी हुई बर्फ को पिघलाने का काम किया है वह उत्तराखंड समेत पूरे देश के लिए अच्छा ही है क्योंकि सरकारों का किसी भी सामाजिक रूप से सक्रिय संगठन और उसके संचालकों से अनावश्यक संघर्ष केवल ज़मीनी स्तर पर आम लोगों के लिए नुकसान देह साबित होता है.
                                                                  आज योगगुरु की पहचान भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में है क्योंकि उनके योग के प्रचार प्रसार के लिए किये जा रहे सार्थक प्रयासों से बहुत लोगो को लाभ पहुँच रहा हैं और वे स्वस्थ जीवन शैली अपनाने में सफल हो पा रहे हैं. यदि उनके विस्तार कार्यक्रमों को सरकार चला रहे रहे दलों द्वारा कानून सम्मत सहयोग दिया जाता रहे तो वे आने वाले समय में सामाजिक स्तर पर परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं. सरकार की कुछ सीमायें हुआ करती हैं यह बात योगगुरु को भी समझनी चाहिए और उन्हें भी अनावश्यक रूप से किसी भी सरकार से आर्थिक और कानूनी मुद्दों पर संघर्ष का रास्ता अपनाने से बचना चाहिए. देश के कुछ कानून ऐसे भी हैं कि जिन्हें किसी भी सूरत में मानकों के अनुसार पूरा नहीं किया जा सकता है तो उस स्थिति में औषधि का व्यापार करने वाले योगगुरु के लिए कानूनी शिकंजे में आने के बहुत सारे छिपे मार्ग सदैव ही खुले रहने वाले हैं.
                                                                हरीश रावत कांगेस के उन नेताओं में से हैं जो ज़मीनी हकीकत को अच्छी तरह से समझते हैं और उसके अनुरूप अपने को ढालने के प्रयास भी किया करते हैं. उत्तराखंड में उनके सीएम बनने से जहाँ लोगों तक सरकार की पहुँच आसान हुई है वहीं वे राज्य बनने के समय से ही लंबित मुद्दों पर निर्णय करने के लिए संकल्पित भी लगते हैं. गैरसैण में राज्य की स्थायी राजधानी बनाने की दिशा में उनके क़दमों की सराहना शुरू हो चुकी है और आने वाले समय के लिए वे खुद चोट खाने के बाद भी आगे बढ़कर सरकार का नेतृत्व करने में लगे हुए हैं. इस तरह से यथार्थ को समझने वाले नेताओं के सत्ता सँभालने से सरकार की पहुँच समाज के निचले स्तर तक हो जाती है और वह आसानी से अपना काम करने की दिशा में बढ़ सकती है. सामाजिक कार्यों को सम्पादित करने वाले किसी भी व्यक्ति या संस्था के साथ राज्य सरकारों का बेहतर समन्वय देश को आगे बढ़ाने का काम करता है और उत्तराखंड की सरकार तथा योगगुरु ने जिस तरह से एक दूसरे पर फिर से विश्वास करने की दिशा में बढ़ना शुरू किया वह देश के लिए ही अच्छा है.     
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काले धन की काली राजनीति

                                                                देश में काले धन को लेकर जिस तरह से सदैव ही राजनीति की जाती रही है अब उसमें बयानबाज़ी का नया आयाम भी जुड़ चुका है अभी तक काले धन के मामले में किसी भी दल के प्रयास रंग लाते नहीं दिख रहे हैं पर जब से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया था तभी से कुछ आशा जगी है कि भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय कानून के दायरों के बाहर जाकर जमा किये गए धन के बारे में अब कुछ निर्णायक दौर भी शुरू हो सकता है. स्विस बैंक जिस तरह से काले धन के लिए जाने और बदनाम किये जाते हैं वह उनके व्यापार का हिस्सा है पर ऐसा भी नहीं है कि वहां पर भारतीयों का जो भी धन जमा है वह सब काला धन ही है. कानून के अनुसार वहां पर किसी भी व्यक्ति के धन को यदि सम्बंधित देश के आयकर और अन्य कानूनों से जुड़े पहलुओं को अनदेखा कर जमा किया है तो भारत सरकार अपने यहाँ इस तरह के मामलों में मुक़दमे दर्ज़ कर उनके नाम सार्वजनिक कर सकती है अन्यथा इससे बैंक और देशों की गोपनीयता का उल्लंघन होता है.
                                                                 सबसे पहले इस मामले में २०११ में भारत सरकार ने पहल करते हुए कई देशों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं शुरू की थीं जिसके बाद ही इस तरह के नतीजे पर पहुंचा गया कि अब स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन की बात साबित होने पर उन लोगों के खिलाफ मुक़दमे दर्ज़ किये जा सकते हैं जिन्होंने उनका उल्लंघन किया है. यह सिर्फ कानूनी पहलू है और इस मामले की जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट द्वारा निगरानी भी की जा रही है तो इसमें किसी भी दल के नेता को अनावश्यक बयानबाज़ी करने से बचना भी चाहिए. इस कानूनी मज़बूरी को विपक्ष में रहते हुए भाजपा सरकार सरकार द्वारा दोषियों को बचाने के आरोप लगाया करती थी जबकि उसे भी वस्तुस्थिति का पता था पर वे बयान कहीं न कहीं उसे राजनैतिक बढ़त दिलवाया करते थे इसलिए कभी भी उस पर कोई रोक लगाने के प्रयास नहीं किये गए और आज उसे भी उसी तरह के कानून के चलते सीमित कदम उठाने को मज़बूर होना पड़ रहा है.
                                                               वित्त मंत्री के रूप में जेटली का यह कहना कि नामों के खुलासे से उनके विपक्षी दल को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ेगा किस संकेत को दर्शाता है क्योंकि यदि किसी भी बड़े या छोटे नेता का नाम इसमें शामिल है तो सरकार को भी इस तरह के बयानों से परहेज़ करना चाहिए. यदि कोई ऐसा व्यक्ति है तो वह आने वाले समय की आहट पाकर देश को छोड़कर भी जा सकता है ? सरकार को बिना किसी बयानबाज़ी के कानूनी मसले को जल्दी से निपटना चाहिए और जो भी दोषी साबित हो उसके खिलाफ पूरी सक्रियता से न केवल मुक़दमा चलाना चाहिए बल्कि काले धन से निपटने के लिए एक विशेष कानून बनाकर दोषियों को त्वरित रूप से दण्डित करने का प्रावधान भी किया जाना चाहिए क्योंकि यदि बाद में कानून बनाया जाता है तो उससे इन मुक़दमों को कहीं न कहीं कोई कानूनी सुरक्षा भी मिल सकती है और दोषी लम्बे समय तक अपनी मनमानी करते रह सकते है. कांग्रेस की तरफ जेटली द्वारा ऊँगली उठाये जाने के बाद पार्टी को भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि जिस किसी भी व्यक्ति के खिलाफ गैरकानूनी रूप से धन जमा करने का मुक़दमा दर्ज़ किया जायेगा उसका पार्टी में कोई भविष्य नहीं रह जायेगा.   
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कर्म से चिकित्सक और बहुत कुछ करने की आशा के साथ जीवन की अनवरत यात्रा पर बढ़ने का क्रम जारी.....

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