मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 3 सितंबर 2014

राजनैतिक नियुक्तियां और राजनीति

                                                                        सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम का नाम जिस तरह से केरल के राज्यपाल के रूप में सामने आ रहा है उसके बाद देश में इन पदों पर बैठने वाले लोगों को लेकर अभी तक चली आ रही परंपरा पर बहस छिड़ने की सम्भावना बलवती हो गयी है. किसी भी केंद्र सरकार को संविधान ने यह छूट दे रखी है कि वह अपनी पसंद से किसी भी राज्य में किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति कर सकती है और आज़ादी के बाद से ही वरिष्ठ नेताओं को इस तरह के पद देकर उनकी राजनैतिक सेवाओं को जीवन के अंतिम समय में कुछ सुगम किया जाता रहा है तथा कई बार प्रभावशाली नेताओ को केंद्र की राजनीति से दूर करने के लिए ही उनको इस तरह के पद देकर शांत किया जाता रहा है और लगभग सभी प्रधानमंत्रियों ने इस अघोषित नियम का अपनी सुविधानुसार अनुपालन भी किया है. देश के संविधान को लचीला बनाये जाने के पीछे मुख्य कारण यही था कि आवश्यकता पड़ने पर उसमें से ही किसी भी समस्या का कोई रास्ता निकाला जा सके.
                                                                         सत्ता से बाहर रहते हुए तथा इस वर्ष सत्ता में पहुँचने तक भाजपा इस बात की पक्षधर रही है कि किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी भी व्यक्ति को इस तरह से किसी भी राजनैतिक महत्त्व और उद्देश्यों को पूरा करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. पिछले वर्ष जब से भाजपा में पुरानी पीढ़ी को किनारे करने और नयी पीढी को सामने लाने की कोशिशें शुरू हुई हैं तब से खुद आज की भाजपा में कितने परिवर्तन आ चुके हैं यह सभी को दिखाई भी दे रहा है और परम्पराओं को पालने पोसने वाले नेताओं के स्थान पर हर परंपरा और कानून को पुराना बताकर बदलने की एक नयी कवायद रोज़ ही देश में दिखाई भी देने लगी है. कोई भी राजनैतिक दल किस तरह की नीतियों से चलना चाहता है यह उसके नेतृत्व पर ही निर्भर करता है और इस मामले पर अन्य लोगों को मुद्दों पर आलोचना करने का अधिकार तो है पर किसी की कार्यशैली पर कोई लगाम नहीं लगा सकता है.
                                                                अभी तक जो भाजपा देश में चल रहे सिद्धांतों और परम्पराओं को मान रही थी आज उसकी वह पीढ़ी हाशिये पर पहुँच चुकी है और अब उससे उस तरह के मानदंडों को पूरा करने की आशा करनी भी नहीं चाहिए. बेशक पुराने पड़ चुके नियमों को समाप्त किया जाना चाहिए और उनके स्थान पर आज के हिसाब से नए कानूनों को स्थान दिया जाना चाहिए पर जिन बातों पर पार्टी के विपक्ष में रहते हुए असहमति रहा करती थी आज वे सही कैसे होते जा रहे हैं ? या तो पार्टी तब गलत हुआ करती थी या फिर वह आज अपनी मनमानी करने की तरफ बढ़ना चाहती है. कांग्रेस ने जो कुछ भी परंपरा के नाम पर देश को दिया वह उस समय का है जब विपक्ष इन मुद्दों पर कोई आवाज़ नहीं उठाता था पर भाजपा लम्बे समय तक इन मुद्दों पर अपने विरोध को दिखाती रही है तो क्या देश की पहली गैर कोंग्रेसी सरकार होने के नाते उस पर परिवर्तन करने की यह ज़िम्मेदारी और भी अधिक नहीं आ जाती है पर शायद लाभ के स्थान पर परम्पराओं के अनुपालन और संभावित हानि के स्थान पर विपक्ष को संख्या बल के आधार पर नीचा दिखाने की सोच के साथ ही यह सरकार आगे बढ़ने का संकल्प भी ले चुकी है.    
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मंगलवार, 2 सितंबर 2014

जापान की परमाणु नीति

                                                                         दुनिया भर में परमाणु हमले की विभीषिका को झेलने वाले एकमात्र देश जापान ने जिस तरह से हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले के बाद से अपनी तकनीक और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े हुए हर मुद्दे पर एकदम स्पष्ट नीति अपना रखी है उसने उस पर चलते हेु ही भारत को फिलहाल परमाणु क्षेत्र में असैनिक मामलों में भी किसी तरह की मदद करने का ठोस आश्वासन नहीं दिया है. २००८ में अमेरिका के साथ हुए १२३ समझौते के बाद से ही जिस तरह से भारत की स्वीकार्यता वैश्विक पटल पर एक ज़िम्मेदार परमाणि शक्ति होने के रूप में बढ़ी है आज पीएम उस पर ही चलकर जापान से बात करके कुछ हासिल करने की तरफ बढ़ चुके हैं. जापान में इस तरह के मुद्दों पर एक सर्वमान्य राजनैतिक सहमति है और उससे कोई भी नेता अलग नहीं हटना चाहता है जिससे जापान के परमाणु कार्यक्रमों की सहभागिता परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर न करने वाले देशों के साथ नहीं हो पाती है.
                                                     आज पूरे एशिया में जिस तरह से चीन अपने सीमा विवादों को हवा देता रहता है उससे भारत और जापान समान रूप से त्रस्त हैं तो उस परिस्थिति में विश्लेषक यह मान रहे थे कि संभवतः जापान अपने स्थापित रुख में परिवर्तन करते हुए भारत को अमेरिका की तरह कुछ विशेष छूट भी दे सकता है ? दोनों ही देशों के लिए यह मुद्दा अभी भी खत्म नहीं हुआ है और इस पर दोनों देशों की सरकारें आगे भी बातचीत करती ही रहेंगी जिससे संभवतः आने वाले समय में जापान भी भारतीय परमाणु नीति से संभवतः सहमत होकर असैनिक क्षेत्र में बड़े सहयोग की तरफ बढ़ना शुरू कर दे. अभी तक केवल रूस और फ़्रांस ही भारत के असैनिक परमाणु क्षेत्र में विशेषकर ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं क्योंकि अमेरिका के घरेलू मसलों और आर्थिक स्थिति के कारण ही वहां की कंपनियां आज के समय में भारत के कड़े नियमों के साथ परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में नहीं टिक पा रही हैं. भारत के लिए जापान पहले की तरह ही आने वाले समय में और भी विश्वसनीय सहयोगी के रूप में सामने आ सकता है.
                                                     यदि ऊर्जा क्षेत्र की बात की जाये तो पीएम जिस तरह से देश में औद्योगिक माहौल को सुधारने को अपनी प्राथमिकता में लेकर चल रहे हैं तो उसे पूरा करने के लिए आज देश की संभावित ऊर्जा आवश्यकताओं पर भी विचार किये जाने की ज़रुरत है. जापान ने आज जिन कारणों से भारत को परमाणु क्षेत्र में सहयोग नहीं देने का निर्णय किया है तो वह देश के लिए एक चुनौती और अवसर भी हो सकता है क्योंकि जब १९९८ के परमाणु परीक्षण के बाद के प्रतिबंधों के चलते रूस ने क्रायोजेनिक तकनीकी देने से मना कर दिया था तो भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने दम पर इसे बनाने के संकल्प के साथ काम करना शुरू कर दिया था और उसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आये थे. जापान को इस बात पर भी भारत की तरफ से आश्वस्त किये जाने के क्रम में ही पीएम ने जापान यात्रा से पहले यह भी कहा था कि भारत की परमाणु नीति पर देश में पूरी सहमति है और कोई भी इससे अलग नहीं सोचता है क्योंकि भाजपा के घोषणापत्र में परमाणु हथियारों के प्रयोग पर उदार बातों को काम स्थान दिया गया था जिससे जापान भी चिंतित था.      
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कर्म से चिकित्सक और बहुत कुछ करने की आशा के साथ जीवन की अनवरत यात्रा पर बढ़ने का क्रम जारी.....

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